योग
भौतिक पदार्थ हमें क्षणिक सुख देते हैं । उसी प्रकार का अथवा उससे अधिक मनभावन सुख पुन: प्राप्त करने के लिए मन लालायित रहता है । इस प्रकार भोग की लालसा अतृप्ति और असन्तोष उत्पन्न करती है । जैसे सुषुप्ति अवस्था में मन इच्छाओं से मुक्त रहकर शरीर को थकावट और तनाव से मुक्त कर नयी ऊर्जा से भर देता है वैसे ही जाग्रत अवस्था में इच्छारहित मन आत्मानन्द का अनुभव करता है । अनासक्त मन परमात्मा के आनन्द स्वरूप से एकत्व के लिए आगे बढ़ता है जिसे योग कहते हैं । परमात्मा से एकत्व प्राप्त कर पुनर्जन्म के बन्धन से मुक्त होने के लिए अपने स्वभाव के अनुसार प्रमुख चार योगों में से किसी योग को अपनाया जा सकता है । कर्मठ व्यक्ति के लिए योग का अर्थ है व्यष्टि और समष्टि मानवता की एकता या अभेद । भावनात्मक व्यक्ति या भक्त के लिए योग का अर्थ है अपने और प्रेमास्पद भगवान् के बीच अभिन्नता । ज्ञानी के लिए योग का अर्थ है यावत्-अस्तित्व का एकत्व या परमात्मा रूपी सिन्धु से अलग न समझना । मन का संयमन करने वाले अर्थात् राजयोगी के लिए जीवात्मा तथा परमात्मा की एकता एकाग्र मन से ही सम्भव है जिसका चरम समाधि अवस्था में है । इस प्रकार कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और राजयोग ये चार मुक्ति के मार्ग हैं ।
BhaktiYoga
Sushil Sahitya
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