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हिन्दुओं के प्राचीनतम धर्मग्रन्थ ऋग्वेद के अध्ययन से प्राय: यह निष्कर्ष
निकाला जाता है कि उसमें इन्द्र,
मित्र,
वरुण आदि विभिन्न देवताओं की स्तुति की गयी है । किन्तु बहुदेववाद की
अवधारणा का खण्डन करते हुए ऋग्वेद स्वयं ही कहता है-
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्
।
एकं
सद्
विप्रा
बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातरिश्वानमाहु:
।
(१-१६४-४६)
जिसे लोग इन्द्र,
मित्र,वरुण
आदि कहते हैं,
वह सत्ता केवल एक ही है;
ऋषि लोग उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं
।
वास्तविक पुराण तो विभिन्न
पन्थों के निर्माण में कहीं खो गया है । किन्तु वास्तविक पुराण के कुछ
श्लोक ईश्वर के एकत्व को स्पष्ट करते हैं । यथा
:-
सत्त्वं
रजस्तम
इति
प्रकृतेर्गुणास्तै-
र्युक्त:
पर:
पुरुष
एक
इहास्य
धत्ते
स्थित्यादये
हरिविरंचि
हरेति
संज्ञा:
श्रेयांसि तत्र खलु सत्त्ववतनोर्नृणां स्यु:
।
प्रकृति के तीन गुण हैं
:-
सत्त्व,
रज और तम;
इनको स्वीकार करके इस संसार की स्थिति,
उत्पत्ति और प्रलय के लिए एक अद्वितीय परमात्मा ही विष्णु
,
ब्रह्मा और रुद्र - ये तीन नाम ग्रहण करते हैं।
ऊपरी तौर पर यह
लगता
है कि हिन्दू वैष्णव,
शैव,
शाक्त,
गाणपत्य आदि सम्प्रदायों में बँटा हुआ है किन्तु सत्य यही है कि कर्ता
ब्रह्म के किसी विशेषण जैसे विष्णु (सर्वव्यापी ईश्वर),
शिव (कल्याणकर्ता ईश्वर),
दुर्गा (सर्वशक्तिमान ईश्वर),
गणेश (परम बुद्धिमान या सामूहिक बुद्धि का द्योतक ईश्वर) की उपासना ही होती
है । इसीलिए हिन्दू विष्णु,
शिव,
दुर्गा,
काली आदि के नाम से बने मन्दिरों में समान श्रद्धा से जाता है
।
उपनिषदों में एकत्व की खोज के
लिए विशेष प्रयत्न किया गया है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि जीवात्मा
और परमात्मा में अग्नि की लपट और उसकी चिनगारी जैसा सम्बन्ध है । ईश्वर अलग
किसी स्थान पर नहीं बैठा है । उसका वास हमारे हृदय में है,
सर्वत्र है । वही सत्य रूप में सर्वत्र प्रकाशित है । परमात्मा ही सब कुछ
है;
तभी तो उससे प्रार्थना की जाती है
:-
तेजो सि तेजो मयि धेहि,
वीर्यमसि वीर्य मयि धेहि,
बलमसि बलं
मयि धेहि,
ओजोसि ओजो मयि धेहि
।
(यजुर्वेद
१९-९)
(हे
भगवन्! आप
तेजस्वरूप
हैं,
मुझमें तेज स्थापित कीजिए;
आप वीर्य रूप हैं,
मुझे वीर्यवान् कीजिए;
आप बल रूप हैं,
मुझे बलवान बनाइए;
आप ओज स्वरूप हैं,
मुझे ओजस्वी बनाइए।)
वैश्वीकरण पर बल
देते
हुए कहा गया है :-
अयं निज: परो वेति गणना लघुचेतसाम्
।
उदारचरितानां तु
वसुधैव कुटुम्बकम्
।
(यह
अपना है या यह
पराया है,
यह विचार छोटे मन वालों का है । उदार चरित्र वालों के लिए तो सारी पृथ्वी
ही कुटुम्ब है।)
सामाजिक एकता का सन्देश
देते हुए कहा गया है
:-
सह नाववतु सह नौ भुनुक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा
विद्विषावहै । शान्ति: शान्ति: शान्ति:
।
प्रभु हम परस्पर रक्षा करें,
साथ-साथ उपभोग करें,
परस्पर सामर्थ्य बढ़ाकर तेजस्वी बनें । विद्या-बुद्धि बढ़ाकर विद्वेष से
दूर रहें । इस प्रकार
परम
शान्ति का वरण करें
।
सार्वभौम भ्रातृत्व के साथ
सार्वभौम कल्याण की कामना की गयी है
:-
सर्वे
भवन्तु
सुखिन:
सर्वे
सन्तु
निरामया:
।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग्भवेत्
।
सभी सुखी हों,
सभी
निरोगी हों,
सभी को शुभ दर्शन हों और कोई दु:ख से ग्रसित न हो
। |